
सयलवियप्पहँ तुट्टाहँ सिवपयमग्गि वसंतु ।
कम्म-चउक्कइ विलउ गइ अप्पा हुइ अरहंतु ॥195॥
सकलविकल्पानां त्रुटयतां शिवपदमार्गे वसन् ।
कर्मचतुष्के विलयं गते आत्मा भवति अर्हन् ॥१९५॥
अन्वयार्थ : [कर्मचतुष्के विलयं गते] चार घातिया कर्मों के नाश होने से [आत्मा] यह जीव [अर्हन् भवति] अर्हंत होता है, [शिवपदमार्गे वसन्] मोक्षपद के मार्गरूप में ठहरता हुआ [सकलविकल्पानां] समस्त रागादि विकल्पों का [त्रुटयतां] नाश करता है ।
Meaning : By eradicating all traces of Vikalpas , by entering on the Moksha Marga , and by annihilating the four Ghatiya Karmas, this Jiva becomes an Arhat.
श्रीब्रह्मदेव