
केवलणाणिं अणवरउ लोयालोउ मुणंतु ।
णियमेँ परमाणंदमउ अप्पा हुइ अरहंतु ॥196॥
केवलज्ञानेनानवरतं लोकालोकं मन्यमानः ।
नियमेन परमानन्दमयः आत्मा भवति अर्हन् ॥१९६॥
अन्वयार्थ : [केवलज्ञानेन] केवलज्ञान से [लोकालोकं] लोक-अलोक को [अनवरतं जानन्] निरन्तर जानता हुआ [नियमेन] निश्चय से [परमानंदमयः आत्मा] परम आनंदमयी यह आत्मा [अर्हन् भवति] अरहंत होता है ।
Meaning : Verily this Atman becomes an Arhat, the knower of the whole of the Loka and Aloka and the enjoyer of the Parama Ananda by means of A varna-Rahit Kewala Jnana .
श्रीब्रह्मदेव