+ सिद्धों की महिमा -
अण्णु वि बंधु वि तिहुयणहँ सासय-सुक्ख-सहाउ ।
तित्थु जि सयलु वि कालु जिय णिवसइ लद्ध-सहाउ ॥202॥
अन्यदपि बन्धुरपि त्रिभुवनस्य शाश्वतसौख्यस्वभावः ।
तत्रैव सकलमपि कालं जीव निवसति लब्धस्वभावः ॥२०२॥
अन्वयार्थ : [अन्यदपि] फिर वे सिद्ध-भगवान् [त्रिभुवनस्य] तीन लोक के प्राणियों का [बंधुरपि] हित करनेवाले हैं, [शाश्वतसुखस्वभावः] और जिनका स्वभाव अविनाशी सुख है, और [तत्रैव] उसी शुद्ध क्षेत्र में [लब्धस्वभावः] निज-स्वभाव को पाकर [जीव] हे जीव ! [सकलमपि कालं] सदा काल [निवसति] निवास करते हैं ।
Meaning : The Siddha Blagwan is free from birth ard death ; is devoid of the various pains of the four grades of beings, and ever dwells in Kewala (pure, infinite) Darshana (seeing), Jnana (knowledge) and Ananda (bliss or happiness).

  श्रीब्रह्मदेव