
जे भव-दुक्खहँ बीहिया पउ इच्छहिँ णिव्वाणु ।
इह परमप्प-पयासयहँ ते पर जोग्ग वियाणु ॥207॥
ये भवदुःखेभ्यः भीताः पदं इच्छन्ति निर्वाणम् ।
इह परमात्मप्रकाशकस्य ते परं योग्या विजानीहि ॥२०७॥
अन्वयार्थ : [ते परं] वे ही महापुरुष [अस्य परमात्मप्रकाशकस्य] इस परमात्मप्रकाश ग्रंथ के [योग्याः विजानीहि] योग्य जानो, [ये] जो [भवदुःखेभ्यः] संसार के दुःखों से [भीताः] डर गये हैं, और [निर्वाणम् पदं] मोक्ष-पद को [इच्छंति] चाहते हैं ।
Meaning : Those alone are competent to meditate upon the Parmatma Prakasha who are afraid of the various pains of this Samsara and who wish to obtain Nirvana.
श्रीब्रह्मदेव