+ औदयिक भावों को जीव का स्वभाव मानने से आपत्ति -
राग-द्वेष-मद-क्रोध-लोभ-मोह-पुरस्सरा: ।
भवन्त्यौदयिका दोषा: सर्वे संसारिण: सत: ॥55॥
यदि चेतयितु: सन्ति स्वभावेन क्रुधादयः ।
भवन्तस्ते विमुक्तस्य निवार्यन्ते तदा कथम् ॥56॥
अन्वयार्थ : संसारिण: सत: राग-द्वेष-मद-क्रोध-लोभ-मोह-पुरस्सरा: सर्वे दोषा: औदयिका: भवन्ति । यदि क्रुधादय: चेतयितु: स्वभावेन सन्ति तदा ते विमुक्तस्य भवन्त: कथं निवार्यन्ते ?
संसारी जीव के जो राग-द्वेष-मद-क्रोध-लोभ-मोह आदि दोष होते हैं वे सब भाव कर्मों के उदय के निमित्त से होते हैं, अतः औदयिकरूप हैं, स्वभावरूप नहीं ।
यदि क्रोधादिक दोषों का होना जीव के स्वभावस्वरूप माना जाय तो उन दोषों का मुक्त जीव के भी रहने (होने) का निषेध कैसे किया जा सकता है? क्योंकि स्वभाव का कभी अभाव नहीं हो सकता ।