
गुणजीवादय: सन्ति विंशतिर्या: प्ररूपणा: ।
कर्मसंबंधनिष्पन्नास्ता जीवस्य न लक्षणम् ॥57॥
अन्वयार्थ : या: गुणजीवादय: विंशति: प्ररुपणा: ता: कर्मसम्बन्धनिष्पन्ना: जीवस्य लक्षणं न सन्ति ।
गुणस्थान, जीवसमास, मार्गणास्थान आदि बीस प्ररूपणाएँ जीव के कर्म-संबंध से उत्पन्न होनेवाले भाव हैं, वे शुद्ध जीव के लक्षण नहीं हैं ।