
मूर्तो भवत्यमूर्तोऽपि पुण्यपापवशीकृत: ।
यदा विमुच्यते ताभ्याममूर्तोऽस्ति तदा पुन: ॥184॥
अन्वयार्थ : पुण्य-पाप-वशीकृत: अमूर्त: अपि मूर्त: भवति । यदा ताभ्यां विमुच्यते तदा पुन: अमूर्त: अस्ति ।
पुण्य-पापरूप कर्म के वशीभूत हुआ अमूर्तिक जीव भी मूर्तिक हो जाता है और जब जीव उन पुण्य-पाप दोनों कर्मों से छूट जाता है, तब वह अमूर्तिक होता है ।