
विकारं नीयमानोऽपि कर्मभि: सविकारिभि: ।
मेघैरिव नभो याति स्वस्वभावं तदत्यये ॥185॥
अन्वयार्थ : सविकारिभि: कर्मभि: विकारं नीयमान: अपि मेघै: अत्यये नभ: इव तदत्यये स्व-स्वभावं याति ।
जिसप्रकार मेघों से विकार को प्राप्त हुआ आकाश उन मेघों के विघटित हो जाने पर अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त होता है । उसीप्रकार विकारी कर्मों के द्वारा विकार को प्राप्त हुआ यह संसारी जीव उन विकारों के नाश होने पर अपने स्वभाव को प्राप्त होता है ।