
अर्हदादौ परा भक्ति: कारुण्यं सर्वजन्तुषु ।
पावने चरणे राग: पुण्यबन्धनिबन्धनम् ॥186॥
अन्वयार्थ : अर्हत्-आदौ परा भक्ति:, सर्वजन्तुषु कारुण्यं, पावने चरणे राग: पुण्य-बन्ध-निबन्धनम् ।
अरहंत आदि में उत्कृष्ट भक्ति, सर्व प्राणियों में करुणाभाव और पवित्र चारित्र के अनुष्ठान/आचरण में प्रीतिरूप भाव, ये सर्व परिणाम पुण्यबन्ध के कारण हैं ।