+ पापबन्ध के कारण - -
निन्दकत्वं प्रतीक्ष्येषु नैर्घृण्यं सर्वजन्तुषु ।
निन्दिते चरणे राग: पाप-बन्ध-विधायक: ॥187॥
अन्वयार्थ : प्रतीक्ष्येषु (अर्हत्-आदि पूज्येषु) निन्दकत्वं, सर्व-जन्तुषु नैर्घृण्यं, (च) निन्दिते चरणे राग: पाप-बन्ध विधायक: (भवति)
अरहन्तादि पूज्य पुरुषों के सम्बन्ध में निन्दा का परिणाम, सर्व प्राणियों के प्रति निर्दयता का भाव और सप्त व्यसन, तीव्र हिंसादि पापरूप चारित्र संबंधी प्रीतिरूप भाव (बहुमान की प्रवृत्ति) - ये सब पाप का बन्ध करनेवाले हैं ।