
सुखासुख-विधानेन विशेष: पुण्य-पापयो: ।
नित्य-सौख्यमपश्यद्भिर्मन्यते मुग्धबुद्धिभि: ॥188॥
अन्वयार्थ : नित्य-सौख्यं अपश्यद्भि: मुग्धबुद्धिभि: सुख-असुख-विधानेन पुण्य-पापयो: विशेष: मन्यते ।
जो जीव नित्य अर्थात् शाश्वत, सच्चे निराकुल सुख से अपरिचित हैं, वे ही अज्ञानी इंद्रियजन्य सुख-निमित्तक कर्म को पुण्य और दुःख-निमित्तक कर्म को पाप, ऐसा भेद जानते/मानते हैं ।