
स्वयमात्मा परं द्रव्यं श्रद्धते वेत्ति पश्यति ।
शङ्ख-चूर्ण: किमाश्रित्य धवलीकुरुते परम् ॥228॥
अन्वयार्थ : शङ्ख-चूर्ण: किम् आश्रित्य परं धवली कुरुते ? आत्मा स्वयं परं द्रव्यं पश्यति वेत्ति श्रद्धत्ते ।
जैसे शंख का चूर्ण किसी भी अन्य का आश्रय न लेकर स्वयं दूसरे को धवल करता है; वैसे आत्मा स्वयं परद्रव्य को देखता, जानता और श्रद्धान करता है ।