
त्यक्तान्तरेतरग्रन्थो निर्व्यापारो जितेन्द्रियः ।
लोकाचारपराचीनो मलं क्षालयतेऽखिलम् ॥260॥
अन्वयार्थ : त्यक्त-अन्तर-इतर-ग्रन्थ:, निर्व्यापार:, जितेन्द्रिय: लोकाचारपराचीन: अखिलं मलं क्षालयते ।
जो अन्तरंग परिग्रह तथा बहिरंग परिग्रह के संपूर्ण त्यागी; षट्कर्मों से रहित एवं जितेन्द्रिय हैं और लोकाचार से पराङ्मुख हो गये हैं, वे महान योगी सम्पूर्ण कर्म-मल को धो डालते हैं ।