
शुभाशुभ-विशुद्धेषु भावेषु प्रथम-द्वयम् ।
यो विहायान्तिमं धत्ते क्षीयते तस्य कल्मषम् ॥261॥
अन्वयार्थ : शुभ-अशुभ-विशुद्धेषु भावेषु प्रथम-द्वयं विहाय य: अन्तिमं धत्ते तस्य कल्मषं क्षीयते ।
जीव के शुभ, अशुभ एवं विशुद्ध इसतरह तीन भाव हैं । इनमें से पहले शुभ-अशुभ-इन दो भावों को छोड़कर अंतिम विशुद्ध भावों को जो धारण करते हैं, वे साधक कषायों का नाश करते हैं ।