
बाह्यमाभ्यन्तरं द्वेधा प्रत्येकं कुर्वता तपः ।
नैनो निर्जीर्यते शुद्धमात्मतत्त्वमजानता ॥262॥
अन्वयार्थ : शुद्धं आत्मतत्त्वं अजानता बाह्यं आभ्यन्तरं द्वेधा प्रत्येकं तप: कुर्वता एन: न निर्जीर्यते ।
जो जीव निज शुद्ध आत्मतत्त्व को न जानते हुए जिनेन्द्र कथित बाह्य तप और अंतरंग तप - इनमें से प्रत्येक तप का आचरण करता है, तो भी उस जीव के किसी भी कर्म की निर्जरा नहीं होती ।