+ आत्मतत्त्व में लवलीन संयमी को कर्म की निर्जरा - -
कर्म निर्जीर्यते पूतं विदधानेन संयमम् ।
आत्मतत्त्वनिविष्टेन जिनागमनिवेदितम् ॥263॥
अन्वयार्थ : जिनागम-निवेदितं पूतं संयमं विदधानेन आत्म-तत्त्व-निविष्टेन कर्म निर्जीर्यते ।
जिनागम-कथित पवित्र संयम का आचरण करते हुए जो मुनिराज अनादिअनंत, निज, शुद्ध आत्मतत्त्व में लवलीन रहते हैं, उनके ज्ञानावरणादि आठों कर्म निर्जरा को प्राप्त होते हैं ।