
अहमस्मि न कस्यापि न ममान्यो बहिस्ततः ।
इति निष्किंचनो योगी धुनीते निखिलं रजः ॥272॥
अन्वयार्थ : अहं न कस्य अपि अस्मि, न अन्य: बहि: मम , इति तत: निष्किंचन: योगी निखिलं रज: धुनीते ।
मैं किसी का भी नहीं हूँ और न अन्य मेरे हैं; इसप्रकार किसी भी रूप से पर को न अपनाते हुए अपरिग्रही योगिराज सारे कर्मरूपी रज को नष्ट कर देते हैं ।