
मुक्त्वा विविक्तमात्मानं मुक्त्यै येऽन्यमुपासते ।
ते भजन्ति हिमं मूढा विमुच्याग्निं हिमच्छिदे ॥273॥
अन्वयार्थ : विविक्तं आत्मानं मुक्त्वा मुक्त्यै ये अन्यं उपासते ते मूढा: हिमच्छिदे अग्निं विमुच्य हिमं भजन्ति ।
विविक्त त्रिकाली, निज शुद्ध, सुख-स्वरूप भगवान आत्मा को छोड़कर जो अन्य की भी मुक्ति के लिये उपासना करते हैं, वे मूढ़ कष्टदायक अति ठंड का नाश करने के लिये अग्नि को छोड़कर शीतलस्वभावी बर्फ का ही सेवन करते हैं, जो नियम से अनिष्ट फल-दाता है ।