+ जो अन्यत्र देव को ढूँढता है, उसकी स्थिति - -
योऽन्यत्र वीक्षते देवं देहस्थे परमात्मनि ।
सोऽन्ने सिद्धे गृहे शंके भिक्षां भ्रमति मूढधीः ॥274॥
अन्वयार्थ : परमात्मनि देहस्थे (सति) यः देवं अन्यत्र वीक्षते स: म़ूढधी: गृहे अन्ने सिद्धे शंके (सति) भिक्षां भ्रमति ।
वास्तविक देखा जाय तो अपने ही देहरूपी देवालय में परमात्मदेव विराजमान होने पर भी जो अज्ञानी परमात्मदेव को अन्यत्र (मंदिर, तीर्थक्षेत्र आदि स्थान में) ढूँढता है, मैं (अमितगति आचार्य) समझता हूँ कि वह मूढ़बुद्धि अपने ही घर में पौष्टिक और रुचिकर भोजन तैयार होने पर भी दीन-हीन बनकर भिक्षा के लिये अन्य के घरों में भ्रमण करता है ।