+ मोह से जीव, कर्मों से बँधता है - -
कषायोदयतो जीवो बध्यते कर्मरज्जुभिः ।
शान्त-क्षीणकषायस्य त्रुट्यन्ति रभसेन ताः ॥275॥
अन्वयार्थ : कषाय-उदयत: (मूढ़:) जीव: कर्म-रज्जुभि: बध्यते । शान्त-क्षीण-कषायस्य (जीवस्य) ता: (कर्म-रज्जव:) रभसेन त्रुट्यन्ति ।
(मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद और) कषाय के उदय से (मोह-रागद्वेषरूप परिणामों से) यह अज्ञानी जीव आठ कर्मरज्जुरूप बंधनों से बंधता है और जिनके कषायादि विभाव शांत अथवा क्षीण हो जाते हैं, उनके वे (कर्म रज्जुबंधन) शीघ्र टूट जाते हैं ।