
सर्वत्र प्राप्यते पापैः प्रमाद निलयीकृतः ।
प्रमाददोषनिर्मुक्तः सर्वत्रापि हि मुच्यते ॥276॥
अन्वयार्थ : प्रमाद-निलयीकृत: सर्वत्र पापै: प्राप्यते । हि प्रमाद-दोष-निर्मुक्त: सर्वत्र अपि मुच्यते ।
जिन्होंने प्रमाद का आश्रय लिया है वे सर्वत्र पापकर्मों से गृहीत होते हैं । जो प्रमाद के दोष से रहित अप्रमादी हो जाते हैं, वे सदा पापों से मुक्त होते रहते हैं ।