+ स्वतीर्थ-परतीर्थ का स्वरूप - -
स्वतीर्थमलं हित्वा शुद्धयेऽन्यद् भजन्ति ये ।
ते मन्ये मलिनाः स्नान्ति सरः संत्यज्य पल्वले ॥277॥
अन्वयार्थ : ये अमलं स्व (आत्म) तीर्थं हित्वा शुद्धये अन्यत् (तीर्थं) भजन्ति (अहं) मन्ये ते मलिना: सरः संत्यज्य पल्वले स्नान्ति ।
जो अज्ञानी जीव अपने स्वाभाविक तथा अति निर्मल आत्मरूपी तीर्थ को छोड़कर आत्म-शुद्धि (परिणामों की निर्मलता) के लिये अन्य (अतिशयक्षेत्र अथवा सिद्धक्षेत्र रूप तीर्थ) को भजते (स्वीकारते) हैं; मैं (अमितगति आचार्य) समझता हूँ कि वे मूर्ख जीव निर्मल जलवाले सरोवर को छोड़कर मलिन जलवाले छोटे गड्ढे में स्नान करते हैं ।