
स्वात्मानमिच्छुभिर्ज्ञातुं सहनीयाः परीषहाः ।
नश्यत्यसहमानस्य स्वात्म-ज्ञानं परीषहात् ॥278॥
अन्वयार्थ : स्व-आत्मानं ज्ञातुं इच्छुभि: परीषहा: सहनीया:। असहमानस्य स्व-आत्म-ज्ञानं परीषहात् नश्यति ।
अपने आत्मा को जानने के इच्छुक साधुओं को समागत परीषहों को सहन करना चाहिए; क्योंकि यदि सहज उपस्थित परीषहों को मुनिराज सहन नहीं करते हैं, तो उनका प्राप्त किया हुआ आत्म-ज्ञान परीषहों के उपस्थित होनेपर स्थिर नहीं रहता ।