+ प्राप्त सुख-दुःख में समताभाव से निर्जरा - -
अनुबन्धः सुखे दुःखे न कार्यो निर्जरार्थिभिः ।
आर्तं तदनुबन्धेन जायते भूरिकर्मदम् ॥279॥
अन्वयार्थ : निर्जरार्थिभि: सुखे-दु:खे अनुबन्ध: न कार्य: तदनुबन्धेन भूरिकर्मदं आर्तं (ध्यानं) जायते ।
निर्जरातत्त्व के इच्छुक साधकों को सहजरूप से प्राप्त सुख-दुःख में अनुबन्ध (अनुवर्तनरूप) प्रवृत्ति नहीं रखना चाहिए; क्योंकि उस आसक्ति से ही आर्तध्यान होता है, जो अनेक कर्मों के बंध का दाता है ।