
आत्मावबोधतो नूनमात्मा शुद्ध्यति नान्यतः ।
अन्यतः शुद्धिमिच्छन्तो विपरीतदृशोऽखिलाः ॥280॥
अन्वयार्थ : नूनं आत्मा आत्म-अवबोधत: शुद्ध्यति, अन्यत: न । अन्यत: शुद्धिं इच्छन्त: अखिला: विपरीतदृश: ।
वास्तविक देखा जाय तो संसार-स्थित अशुद्ध आत्मा निज शुद्धात्मा को प्रत्यक्ष करने से ही शुद्ध होता है; अन्य किसी साधन से नहीं । जो अज्ञानी जीव अन्य साधनों से आत्मा की शुद्धि चाहते हैं, वे सब जीव मिथ्यादृष्टि हैं ।