
विज्ञातव्यं परद्रव्यमात्मद्रव्य-जिघृक्षया ।
अविज्ञातपरद्रव्यो नात्मद्रव्यं जिघृक्षति ॥283॥
अन्वयार्थ : आत्मद्रव्य-जिघृक्षया परद्रव्यं विज्ञातव्यं । अविज्ञात परद्रव्य: आत्मद्रव्यं न जिघृक्षति ।
आत्मद्रव्य को ग्रहण करने की इच्छा से परद्रव्य को जानना चाहिए । जो परद्रव्य के ज्ञान से रहित है वह आत्मद्रव्य के ग्रहण की इच्छा नहीं करता ।