+ आत्मप्राप्त ज्ञानी सुखी - -
उपलब्धे यथाहारे दोषहीने सुखासिकः ।
आत्मतत्त्वे तथा क्षिप्रमित्यहो ज्ञानिनां रतिः ॥294॥
अन्वयार्थ : यथा दोषहीने आहारे उपलब्धे सुखासिक: तथा आत्मतत्त्वे ( उपलब्धे) क्षिप्रं (सुखासिक:) इति ज्ञानिनां अहो रति: !
जिसप्रकार लौकिक जीवन में दोषरहित भोजन मिलने पर मनुष्य को सुख मिलता है, उसीप्रकार शुद्ध आत्मतत्त्व के प्राप्त होने पर ज्ञानी जीव को तत्काल सुख मिलता है । यह ज्ञानियों की आत्म-तत्त्व में आश्चर्यकारी रति (प्रेम) है ।