
परद्रव्यं यथा सद्भिर्ज्ञात्वा दुःख-विभीरुभि: ।
दुःखदं त्यज्यते दूरमात्मतत्त्वरतैस्तथा ॥295॥
अन्वयार्थ : यथा दु:ख-विभीरुभि: सद्भि: परद्रव्यं दुःखदं ज्ञात्वा दूरं त्यज्यते तथा आत्मतत्त्वरतै: ।
जिसप्रकार दुःख से भयभीत सत्पुरुष परद्रव्य को दुःखदायक जानकर दूर से ही छोड़ देते हैं; उसीप्रकार निजशुद्धात्मतत्त्व में मग्न जीव परद्रव्य को दूर से ही छोड़ देते हैं ।