+ विशोधित ज्ञान और अज्ञान का स्वरूप - -
ज्ञाने विशोधिते ज्ञानमज्ञानेऽज्ञानमूर्जितम् ।
शुद्धं स्वर्णमिव स्वर्णे लोहे लोहमिवाश्नुते ॥296॥
अन्वयार्थ : (यथा) स्वर्णे (विशोधिते) शुद्धं स्वर्ण इव लोहे (च) लोहं इव अश्नुते । (तथा) ज्ञाने विशोधिते ज्ञानं अज्ञाने (च) अज्ञानं ऊर्जितं भवति ।
जैसे स्वर्ण के विशोधित होने पर शुद्ध स्वर्ण और लोहे के विशोधित होने पर शुद्ध लोहा गुणवृद्धि (अतिशय) को प्राप्त होता है; वैसे ज्ञान के विशोधित होने पर ज्ञान और अज्ञान के विशोधित होने पर अज्ञान ऊर्जित (अतिशय) को प्राप्त होता है ।