
कषाय-विकथा-निद्रा-प्रोक्षार्थ-परांमुखाः ।
जीविते मरणे तुल्याः शत्रौ मित्रे सुखेऽसुखे ॥412॥
आत्मनोऽन्वेषणा येषां भिक्षा येषामणेषणा ।
संयता सन्त्यनाहारास्ते सर्वत्र समाशयाः ॥413॥
अन्वयार्थ : कषाय-विकथा-निद्रा-प्रोक्षार्थ -परांमुखा: जीविते मरणे शत्रौ मित्रे सुखे असुखे तुल्या: । येषां आत्मन: अन्वेषणा च येषां अणेषणा भिक्षा , ते सर्वत्र समाशया: संयता: अनाहारा: सन्ति ।
जो मुनिराज क्रोधादि चार कषायों से, स्त्रीकथादि चार विकथाओं से, स्पर्शादि प्रीतिकर पाँच इन्द्रियविषयों से, निद्रा एवं स्नेहरूप इन पन्द्रह प्रमाद परिणामों से विमुख/रहित हैं अर्थात् शुद्धोपयोग में मग्न/लीन रहते हैं; जीवन-मरण, शत्रु-मित्र एवं सुख-दु:ख में समताभाव / वीतरागभाव धारण करते हैं, जो सतत आत्मा की अन्वेषणा/खोज में लगे रहते हैं जिनका आहार इच्छा से रहित अर्थात् नियम से अनुदिष्ट/सहज प्राप्त रहता है, जो अनुकूल-प्रतिकूल सब संयोग-वियोग में सर्वत्र सदा राग-द्वेष परिणामों से रहित अर्थात् वीतराग परिणाम से परिणमित रहते हैं, उन मुनिराजों को अनाहारी संयत कहते हैं ।