+ देहमात्र परिग्रहधारी साधु का स्वरूप - -
यः स्वशक्तिमनाच्छाद्य सदा तपसि वर्तते ।
साधुः केवलदेहोऽसौ निष्प्रतीकार-विग्रहः ॥414॥
अन्वयार्थ : य: निष्प्रतीकार-विग्रह: स्व-शक्तिं अनाच्छाद्य सदा तपसि वर्तते, असौ केवलदेह: (देहमात्रपरिग्रह:) साधु: (अस्ति)
जो मुनिराज शरीर का प्रतिकार अर्थात् शोभा, शृंगार, तेल मर्दनादि संस्कार करनेरूप राग परिणाम से रहित हैं, संयोगों में प्राप्त अपनी शरीर की सामर्थ्य और पर्यायगत अपनी आत्मा की पात्रता को न छिपाते हुए सदा अंतरंग एवं बाह्य तपों को तपने में तत्पर रहते हैं, वे देहमात्र परिग्रहधारी साधु हैं ।