
एका सनोदरा भुक्तिर्मांस-मध्वादिवर्जिता ।
यथालब्धेन भैक्षेण नीरसा परवेश्मनि ॥415॥
अन्वयार्थ : भुक्ति: पर-वेश्मनि भैक्षेण यथालब्धेन एकासनोदरा मांस-मधु आदि-वर्जिता नीरसा ।
देहमात्र परिग्रहधारी मुनिराज/श्रमण का आहार नियम से पराये घर पर ही होता है । वह आहार भिक्षा से प्राप्त, यथालब्ध, ऊनोदर के रूप में, दिन में एकबार, मद्य-मांस आदि सदोष पदार्थों से रहित और मधुर/मीठा रस आदि रसों से रहित प्राय: नीरस ही होता है ।