
तान्येव ज्ञान-पूर्वाणि जायन्ते मुक्तिहेतवे ।
अनुबन्धः फलत्वेन श्रुतशक्तिनिवेशितः ॥441॥
अन्वयार्थ : तानि एव ज्ञान-पूर्वाणि जायन्ते मुक्तिहेतवे श्रुतशक्तिनिवेशित: अनुबन्ध: फलत्वेन ।
बुद्धिपूर्वक होनेवाले कार्य ही जब आगम-ज्ञानपूर्वक होने लगते हैं तो वे ही कार्य मोक्ष के लिये कारणरूप अर्थात् मोक्षमार्गरूप बन जाते हैं; क्योंकि श्रुतशक्ति को लिये हुए जो अनुराग है वह क्रम से / परंपरा से मोक्षरूप फल का दाता हो जाता है ।