
कल्मषाभावतो जीवो निर्विकारो विनिश्चलः ।
निर्वात-निस्तरंगाब्धि-समानत्वं प्रपद्यते ॥499॥
अन्वयार्थ : कल्मषाभावतः जीवः निर्वात-निस्तरंगाब्धि-समानत्वं निर्विकारः विनिश्चलःप्रपद्यते ।
जिसप्रकार वायु तथा तरंग के अभाव से समुद्र-निर्विकार तथा निश्चल / स्थिर होता है; उसीप्रकार मिथ्यात्व एवं कषायरूप कल्मष के अभाव से मोक्षमार्गस्थ आत्मा निर्विकार एवं निश्चल होता है अर्थात् सिद्धपरमात्मा हो जाता है ।