
अक्ष-ज्ञानार्थतो भिन्नं यदन्तरवभासते ।
तद्रूपमात्मनो ज्ञातृज्ञातव्यमविपर्ययम् ॥500॥
अन्वयार्थ : अक्ष-ज्ञानार्थत: भिन्नं यत् अन्त: अवभासते, तत् ज्ञातृज्ञातव्यं आत्मन: अविपर्ययं रूपं ।
इंद्रियज्ञान के विषयों से भिन्न अंतरंग में ज्ञाता के द्वारा ज्ञातव्य अर्थात् अनुभव में आनेवाला जो पदार्थ है, वही आत्मा का विपरीतता से रहित यथार्थ स्वरूप है ।