+ पुण्य और पाप में बन्ध की अपेक्षा समानता -
जह लोहम्मिय णियउ बुह, तह सुण्णम्मिय जाणि
जे सुहु असुह परिच्चयहिँ, ते वि हवंति हु णाणि ॥72॥
लोह और सुवर्ण की बेड़ी में अन्तर है नहीं
शुभ-अशुभ छोड़ें ज्ञानिजन दोनों में अन्तर है नहीं ॥
अन्वयार्थ : [जह लोहम्मिय णियउ बुह] जैसी लोहे की बेड़ी होती है हे ज्ञानी ! [तह सुण्णम्मिय जाणि] वैसे ही सोने की बेड़ी होती है, [जे सुहु असुह परिच्चयहिँ] जो शुभ और अशुभ दोनों को त्याग देते हैं, [ते वि हवंति हु णाणि] वे ही वास्तव में ज्ञानी होते हैं ।