
जं वड्मज्झहँ बीउ फुडु, बीयहँ बडु वि हु जाणु
तं देहहँ देउ वि मुणहि, जो तइलोय-पहाणु ॥74॥
जिस भाँति बड़ में बीज है उस भाँति बड़ भी बीज में
बस इस तरह त्रैलोक्य जिन आतम बसे इस देह में ॥
अन्वयार्थ : [जं वड्मज्झहँ बीउ फुडु] जैसे बरगद के वृक्ष में बीज को देखकर [बीयहँ बडु वि हु जाणु] बीज में वट भी जानने में आता है, [तं देहहँ देउ वि मुणहि] उसीप्रकार इस देह में देव को जानो [जो तइलोय-पहाणु] जो तीनों लोक में प्रधान है ।