
जो जिण सो हउँ सो जि हउँ, एहउ भाउ णिभंतु
मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु ण तंतु ण मंतु ॥75॥
जिनदेव जो मैं भी वही इस भाँति मन निर्भ्रान्त हो
है यही शिवमग योगिजन ! ना मंत्र एवं तंत्र है ॥
अन्वयार्थ : [जो जिण सो हउँ] जो जिन है वही मैं हूँ [सो जि हउँ] इसलिए मैं ही जिन हूँ [एहउ भाउ णिभंतु] ऐसी निःसंदेह भावना कर [मोक्खहँ कारण जोइया] मोक्ष का कारण यही है हे योगी ! [अण्णु ण तंतु ण मंतु] अन्य कोई तन्त्र-मन्त्र आदि नहीं ।