+ तीन को छोड़ तीन गुण सहित आत्मा में वास करो -
तिहिँ रहियउ तिहिँ गुण-सहिउ, जो अप्पाणि वसेइ
सो सासय-सुइ-भायणु वि, जिणवरु एम भणेइ ॥78॥
तज तीन त्रयगुण सहित निज परमातमा में जो बसे
शिवपद लहें वे शीघ्र ही - इस भाँति सब जिनवर कहें ॥
अन्वयार्थ : [तिहिँ रहियउ तिहिँ गुण-सहिउ] तीन (मोह-राग-द्वेष) से रहित होकर और तीन गुणों (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र) से सहित होकर [जो अप्पाणि वसेइ] जो आत्मा में निवास करता है, [सो सासय-सुइ-भायणु वि] वह शाश्वत सुख का पात्र होता है, [जिणवरु एम भणेइ] ऐसा जिनवर कहते हैं ।