
चउ-कसाय-सण्णा-रहिउ, चउ-गुण-सहियउ वुत्तु
सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ, जिम परु होहि पवित्तु ॥79॥
जो रहित चार कषाय संज्ञा चार गुण से सहित हो
तुम उसे जानो आतमा तो परमपावन हो सको ॥
अन्वयार्थ : [चउ-कसाय-सण्णा-रहिउ] चार कषायों व चार संज्ञाओं से रहित [चउ-गुण-सहियउ वुत्तु] चार गुणों से सहित, [सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ] उस आत्मा की हे जीव ! तू श्रद्धा कर, [जिम परु होहि पवित्तु] जिससे तू परम-पवित्र हो सके ।