+ पांच-पांच को छोड़ पांच-पांच गुण सहित आत्मा में वास करो -
बे-पंचहँ रहियउ मुणहि, बे-पंचहँ संजुत्तु
बे-पंचहँ जो गुणसहिउ, सो अप्पा णिरु वुत्तु ॥80॥
जो दश रहित दश सहित एवं दश गुणों से सहित हो
तुम उसे जानो आतमा अर उसी में नित रत रहो ॥
अन्वयार्थ : [बे-पंचहँ रहियउ मुणहि] पांच (इन्द्रिय विषय) और पांच (अव्रत) से रहित, पांच (इन्द्रिय विजय) और पांच (महाव्रत) से संयुक्त, [बे-पंचहँ जो गुणसहिउ] ऐसे पांच-पांच गुण सहित, [सो अप्पा णिरु वुत्तु] उसे ही निश्चय से आत्मा कहा गया है ।