
अप्पा दंसणु णाणु मुणि, अप्पा चरणु वियाणि
अप्पा संजमु सील तउ, अप्पा पच्चक्खाणि ॥81॥
निज आतमा है ज्ञान दर्शन चरण भी निज आतमा
तप शील प्रत्याख्यान संयम भी कहे निज आतमा ॥
अन्वयार्थ : [अप्पा दंसणु णाणु मुणि] आत्मा को ही दर्शन-ज्ञान जानो, [अप्पा चरणु वियाणि] आत्मा को ही चारित्र समझो, [अप्पा संजमु सील तउ] आत्मा ही संयम, शील, तप है [अप्पा पच्चक्खाणि] आत्मा ही प्रत्याख्यान है ।