+ पर-भावों का त्याग ही संन्यास है -
जो परियाणइ अप्प परु, सो परु चयइ णिभंतु
सो सण्णासु मुणेहि तहुँ, केवल-णाणिं उत्तु ॥82॥
जो जान लेता स्व-पर को निर्भ्रान्त हो वह पर तजे
जिन-केवली ने यह कहा कि बस यही संन्यास है ॥
अन्वयार्थ : [जो परियाणइ अप्प परु] जो स्व और पर को पहचान लेता है, [सो परु चयइ णिभंतु] वह निःसन्देह पर का त्याग कर देता है [सो सण्णासु मुणेहि तहुँ] इसे ही संन्यास समझो, [केवल-णाणिं उत्तु] ऐसा केवलज्ञानियों ने कहा है ।