
रयणत्तय-संजुत्त जिउ, उत्तिमु तित्थु पवित्तु
मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु ण तंतु ण मंतु ॥83॥
रतनत्रय से युक्त जो वह आतमा ही तीर्थ है
है मोक्ष का कारण वही ना मंत्र है ना तंत्र है ॥
अन्वयार्थ : [रयणत्तय-संजुत्त जिउ] रत्नत्रय से संयुक्त जीव ही [उत्तिमु तित्थु पवित्तु] उत्तम पवित्र तीर्थ है [मोक्खहँ कारण जोइया] मोक्ष का कारण है हे योगी ! [अण्णु ण तंतु ण मंतु] अन्य कोई मंत्र-तंत्र आदि नहीं ।