+ रत्नत्रय का स्वरूप -
दंसणु जं पिच्छियइ बुह, अप्पा विमल महंतु
पुणु पुणु अप्पा भावियए, सो चारित्त पवित्तु ॥84॥
निज देखना दर्शन तथा निज जानना ही ज्ञान है
जो हो सतत वह आतमा की भावना चारित्र है ॥
अन्वयार्थ : [अप्पा विमल महंतु] निर्मल आत्मा को [दंसणु जं पिच्छियइ बुह] देखना वही दर्शन जानना वही ज्ञान और [पुणु पुणु अप्पा भावियए] पुनः पुनः आत्मा की भावना [सो चारित्त पवित्तु] वही पवित्र चारित्र है ।