
एक्कलउ इंदिय-रहियउ, मण-वय-काय-ति-सुद्धि
अप्पा अप्पु मुणेहि तुहुँ, लहु पावहि सिव-सिद्धि ॥86॥
तू एकला इन्द्रिय रहित मन वचन तन से शुद्ध हो
निज आतमा को जान ले तो शीघ्र ही शिवसिद्ध हो ॥
अन्वयार्थ : [एक्कलउ इंदिय-रहियउ] एकाकी इन्द्रिय रहित होकर, [मण-वय-काय-ति-सुद्धि] मन, वचन और काय से शुद्ध होता हुआ [अप्पा अप्पु मुणेहि तुहुँ] अपनी आत्मा को अपने से जान [लहु पावहि सिव-सिद्धि] तू शीघ्र ही शिव सिद्धि पाएगा ।