+ सम्यग्दृष्टि सुगति पाता है -
सम्माइट्ठी-जीवडहँ, दुग्गइ-गमणु ण होइ
जइ जाइ वि तो दोसु णवि, पुव्वक्किउ खवणेइ ॥88॥
जो जीव सम्यग्दृष्टि दुर्गति-गमन ना कबहूँ करें
यदि करें भी ना दोष पूरब करम को ही क्षय करें ॥
अन्वयार्थ : [सम्माइट्ठी-जीवडहँ] सम्यग्दृष्टि जीव का [दुग्गइ-गमणु ण होइ] दुर्गति में गमन नहीं होता [जइ जाइ वि तो दोसु णवि] यदि कदाचित् जाता भी है तो कोई दोष नहीं है, [पुव्वक्किउ खवणेइ] पूर्वकृत कर्मों का क्षय ही करता है ।