
अप्प-सरूवइँ जो रमइ, छंडिवि सहु ववहारु
सो सम्माइट्ठी हवइ, लहु पावइ भवपारु ॥89॥
सब छोड़कर व्यवहार नित निज आतमा में जो रमें
वे जीव सम्यग्दृष्टि तुरतहिं शिवरमा में जा रमें ॥
अन्वयार्थ : [अप्प-सरूवइँ जो रमइ] जो आत्म-स्वरूप में रमण करता है, [छंडिवि सहु ववहारु] सर्व व्यवहार को छोड़कर [सो सम्माइट्ठी हवइ] वह सम्यग्दृष्टि है और [लहु पावइ भवपारु] शीघ्र ही संसार से पार होता है ।