+ आत्मा में स्थिरता संवर व निर्जरा का कारण है -
अजरु अमरु गुण-गण-णिलउ, जहिँ अप्पा थिरु ठाइ
सो कम्मेहिँ ण बंधियउ, संचिय-पुव्व विलाइ ॥91॥
जहँ होय थिर गुणगणनिलय जिय अजर अमृत आतमा
तहँ कर्मबंधन हों नहीं झर जाँय पूरव कर्म भी ॥
अन्वयार्थ : [अजरु अमरु गुण-गण-णिलउ] अजर, अमर और गुणों के भण्डार [जहिँ अप्पा थिरु ठाइ] ऐसे आत्मा में स्थिर हो जाता है, [सो कम्मेहिँ ण बंधियउ] वह नवीन कर्मों से नहीं बँधता, [संचिय-पुव्व विलाइ] पूर्व-संचित कर्मों की निर्जरा करता है ।