
जह सलिलेण ण लिप्पियइ, कमलणि-पत्त कया वि
तह कम्मेहिं ण लिप्पियइ, जइ रइ अप्प-सहावि ॥92॥
जिसतरह पद्मनि-पत्र जल से लिप्त होता है नहीं
निजभावरत जिय कर्ममल से लिप्त होता है नहीं ॥
अन्वयार्थ : [जह सलिलेण ण लिप्पियइ] जैसे जल से लिप्त नहीं होता [कमलणि-पत्त कया वि] कमलिनी-पत्र कभी भी [तह कम्मेहिं ण लिप्पियइ] उसी तरह कर्मों से लिप्त नहीं होता [जइ रइ अप्प-सहावि] यदि आत्म-स्वभाव में लीनता हो ।